‘धर्म’ के मार्ग पर आधी सदी

भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली ,कला , साहित्य , दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .

पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के अनुसार धर्म किसी भी देश की आत्मा है। एक राष्ट्र के तौर पर भारत की समृद्धि के लिए यह जरूरी है कि हर व्यक्ति धर्म को महत्त्व दे।

स्वामी विवेकानंद ने भी राष्ट्र गौरव के लिए धर्म को महत्त्व दिया था।

हिंदू धर्म हमारे राष्ट्रीय चरित्र का सार है। यदि आप अपने राष्ट्र को बचाना चाहते हैं तो इसे मजबूती से पकड़ कर रखें, नहीं तो अगली तीन पीढ़ियों में नष्ट हो जाएंगे।

स्वामी विवेकानंद

धर्म पर दृढ़ रहते हुए राष्ट्र और समाज को स्वयं से पहले रखने का सिद्धांत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ने का मेरा आधार बना। यहीं से अपने जीवन को राष्ट्र की सेवा में समर्पित करने की मुझमें इच्छा जागृत हुई और आरएसएस के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।

1 मई, 1969 को 14 वर्ष की आयु में मैं आरएसएस से जुड़ा और उसकी विचारधारा को आत्मसात किया। मैं तब नौवीं कक्षा में अव्वल आया था और छुट्टी के दिनों में शाखा जाना शुरू किया था। कृष्णा नगर के पड़ोस के एक पार्क में चर्चा के साथ शाखा की शुरुआत हुई और वहां होने वाली गतिविधियों की ओर मेरा रुझान बढ़ा। धीरे-धीरे मैं शाखा में रवि मल्होत्रा जी, हेमंत बिश्नोई, कुलदीप पुरी, मदन खन्ना और सूर्यदेव त्रिपाठी जैसे स्वयंसेवकों के संपर्क में आया। सूर्यदेव त्रिपाठी ने जो कि उस समय स्थानीय शाखा के प्रमुख शिक्षक थे, मुझे शाखा की गतिविधियों में शामिल कर लिया। इस तरह से विश्व के सबसे विशाल स्वयंसेवकों के आंदोलन से जुड़ने की मेरी यात्रा की शुरुआत हुई, जिसके विश्वभर में पांच लाख से अधिक सक्रिय सदस्य हैं। मेरे इस जुड़ाव के करीब आधी सदी गुजर गए हैं।

मेरे शुरुआती दौर में ही आरएसएस ने मुझे स्वामी विवेकानंद को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। स्वामी जी के एक अमर वाक्य ने मुझे गहरे स्तर तक छुआ- केवल वहीं जीते हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं, बाकी जीवित होते हुए भी मृतक के समान हैं।


राष्ट्रीयता की भावना, सेवा, त्याग, समर्पण और परमात्मा के प्रति मेरी अगाध निष्ठा ने मुझे और मेरे कार्यों को निर्देशित किया। शाखा में शुरुआती दौर के मेरे शिक्षक रहे सूर्यदेव त्रिपाठी जी, हेमंत बिश्नोई जी, अशोक पुरी जी और मदन खन्ना जी आज भी उसी लगन के साथ कार्यों में जुटे हुए हैं। कभी-कभार उनसे मुलाकात होने पर पुराने दिनों की स्मृतियां सजीव हो उठती हैं।

शाखा में प्रवेश के दो वर्षों के भीतर ही मैंने 1971 में जालंधर में आयोजित अधिकारी प्रशिक्षण शिविर (ओटीसी) में भाग लिया। आरएसएस के अनेक बुद्धिजीवियों ने उस शिविर में हमें संबोधित किया था, जिनसे मैं बड़ा प्रभावित हुआ। मुझे वहां पूज्य गुरु गोवलकरजी को करीब से देखने का मौका मिला। उन्होंने लगातार तीन दिन विद्वतापूर्ण- ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिए और समाज में युवा कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, उस पर प्रकाश डाला। उनकी आध्यात्मिक आभा ने मुझे गहराई तक प्रभावित किया।

ओटीसी से लौटने के बाद मुझे मुख्य शिक्षक के तौर पर शाखा चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई और मैं दस साल तक कार्यवाहक रहा।

मेरे जीवन की दूसरी पारी का आरंभ तब हुआ, जब मैंने गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल कॉलेज (जीवीएसएम), कानपुर में मेडिकल में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए दाखिला लिया। वहां मैं आरएसएस के महानगर प्रचारक विष्णु कुमार जी के संपर्क में आया। भारत के निर्माण के प्रति उनका समर्पण और राष्ट्रीयता की भावना ने मुझे प्रेरित किया।

जल्द ही कॉलेज में हमारी शाखा तैयार हो गई और उसकी वजह से मैं आइआइटी कानपुर से भी जुड़ा। मेडिकल कॉलेज में यह शाखा कई वर्षों तक चली।

यह कानपुर ही था, जहां मैं रज्जू भैया और अशोक सिंघल जी के साथ ही बहुत से संघ के वरिष्ठ नेताओं से मिला। उन्होंने न केवल मुझे प्रेरित किया बल्कि संघ के साथ मेरे जुड़ाव को और मजबूत बनाया।

आपातकाल का दौर हमारे लिए काफी चुनौती भरा रहा। हमें अपनी गतिविधियां भूमिगत रहकर संचालित करनी पड़ रही थीं। हमारा लक्ष्य विरोध के साथ ही गतिविधियों को जारी रखने का था। हम साइक्लोस्टाइल्ड एक पेपर काल चिंतन निकालते और बाथरूम की दीवारों और व्याख्यान के सभागारों के बाहर चिपका देते। केंद्र सरकार की तानाशाही के खिलाफ उनमे संदेश लिखे होते थे। स्वाभाविक है कि इन वजहों से हम तत्कालीन शासन की काली सूची में थे।

1977 का वह समय आज भी मेरे ज़ेहन में कौंधता है, जब संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ जयप्रकाश नारायणजी के रूप में राष्ट्रीय परिदृश्य में एक बड़े नेता का उदय हुआ। देश के कोने-कोने में उनकी गूंज सुनाई देने लगी। आपातकाल खत्म होने के तुरंत बाद हम कानपुर से अमेठी (संजय गांधी का गढ़) तक गांव-गांव घूमे। वहां लोगों को शासन, लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों के बारे में जागरूक करते थे। दूसरी बड़ी गतिविधि थी रायबरेली और अमेठी को जोड़ते हुए 1977 के चुनावों के लिए राजनीतिक अभियान की शुरुआत। एक पर्चा छपाया गया, जिसमें तत्कालीन नेताओं की करतूतों और उनकी दमनकारी नीति की सूची छापी गई और लोगों के बीच उसे बांटा गया। अमेठी में हमारी गतिविधियों को मीडिया ने खूब तरजीह दी। सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह असहज स्थिति थी। यहां तक कि हममें से कइयों के अपहरण की भी कोशिश की गई। लेकिन अमेठी में रवींद्र प्रताप सिंह की सहायता से हम कानपुर लौटने में किसी तरह सफल रहे। हमने मेडिकल कॉलेज में जनता पार्टी की जीत पर जश्न भी मनाया। आज भी मैं कानपुर मेडिकल कॉलेज में बिताए गए दिनों को याद कर विभोर हो उठता हूं। यह मेरे लिए किसी बड़े सम्मान से कम नहीं कि आज भी लोग मुझे याद करते हैं।

मेडिकल की पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं दिल्ली लौट आया और एक ईनएनटी सर्जन के तौर पर अपनी प्रैक्टिस शुरू की। जाहिर तौर पर मेरी गतिविधियां दिल्ली केंद्रित हो गईं। उसके बाद संघ ने मुझे डॉक्टर शाखा के गठन की जिम्मेदारी सौंपी। वर्ष 1983 से 1993 तक मैं सक्रिय रूप से झंडेवाला में डॉक्टरों को संगठित करने में जुटा रहा और उनके बीच राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे पर मेडिकल बिरादरी को एकजुट करने पर जोर देता रहा।

1993 में मैंने राजनीति में प्रवेश किया। जबकि मैंने कभी भी सक्रिय राजनीति में किसी भूमिका की कल्पना नहीं की थी। श्री बीएल शर्मा प्रेम ने भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए मेरा विचार जानने की कोशिश की। उनके साथ आए डॉ. सुरेश वाजपेयी, प्रांत कार्यवाहक, (दिल्ली आरएसएस) ने मुझे आश्वस्त किया कि मेरे नाम को अटल जी और आडवाणी जी से सहमति मिल जाएगी। ऐसे में मेरे पास टालने की कोई वजह नहीं बची थी। यहीं से मेरे सार्वजनिक जीवन की यात्रा की शुरुआत हुई थी, जो कि आज तक जारी है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के पांचवें सरसंघचालक के.एस. सुदर्शन जी के साथ डॉ. हर्ष वर्धन।

आरएसएस नेताओं ने मेरी विचारधारा और दृष्टि को आकार दिया। लेकिन पंडित दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद के दर्शन ने मुझे गहराई तक प्रभावित किया। आज भी वे मेरे राजनीति में आदर्श हैं। हालांकि मुझे उनसे मिलने का सौभाग्य नहीं मिला, मगर उनके विचार और कार्य मुझे आज भी प्रेरित करते हैं। अन्य लोग जिन्होंने मेरे कार्यों और विचारों को प्रभावित किया, उनमें रज्जू भैयाजी , केएस सुदर्शन जी, एचवी शेषाद्रिजी, अशोक सिंघल जी., कुशाभाऊ ठाकरेजी और मोहन भागवत जी हैं। और सबसे अधिक अटल जी और आडवाणी जी का ऋणी हूं, जिन्होंने मुझे राजनीति के पथ पर चलना सिखाया।

गुजरात के भुज में 2001 में आए भयंकर भूकंप के बाद मेडिकल टीम को लेकर पीड़ितों की सेवा के लिए पहुंचे डॉ. हर्ष वर्धन।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को संरक्षित करने के लिए मैं कोलकाता में काफी समय तक रहा। डॉ. मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत से जोड़े रखने के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया। काफी प्रयासों के बाद हम डॉ. मुखर्जी कृति संग्रह निकालने में सफल हुए और कोलकाता स्थित उनके आवास का जीर्णोद्धार किया व उनकी स्मृतियों को संजोने में कामयाब रहे।  

इस योजना में मेरे साथ कोई और नहीं बल्कि वर्तमान राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी थे।

समय-समय पर मैं सेवा भारती और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की गतिविधियों में भी शामिल होता था। 26 जनवरी, 2001 को जब गुजरात में भंयकर भूंकप ने तबाही मचा दी थी, मैं आडवाणी जी कहने पर 37 डॉक्टरों का एक दल लेकर भुज पहुंचा और वहां राहत और पुनर्वास के कार्य में चिकित्सा सेवाएं दी। इस समय तक आरएसएस की गतिविधियों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ था और सभी महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल होता था।

पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ डॉ. हर्ष वर्धन।

मैंने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया, उसके लिए मैं संघ का ऋणी हूं और जीवनपर्यंत उसके उद्देश्यों व संदेश के प्रचार के प्रति प्रतिबद्ध रहूंगा और देश सेवा में दिल से जुटा रहूंगा।  मैं संघ के साथ जुड़ाव को अपनी ताकत और ईश्वर का आशीर्वाद मानता हूं।

non-recyclable